आर्थराइटिस की रोकथाम के लिए चलना – फिरना है बहुत ज़रूरी: डॉ. गौरव राठौड़

  |    October 11th, 2018   |   0

विश्व आर्थराइटिस डे पर विशेष – 

 

डॉ. गौरव राठौड़, एसोसिएट डायरेक्टर

डिपार्टमेंट ऑफ आथ्रोपेडिक्स एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट

 जेपी हॉस्पिटल, नोएडा

आर्थराइटिस में जोड़ों में सूजन आ जाती है, जिसके कारण मरीज़ को चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है। आज के शहरी लोग बिल्कुल गतिहीन हो गए हैं, जिसका बुरा असर उनके मसल मांस और हड्डियों की ताकत पर पड़ता है। आज आर्थराइटिस (खासतौर पर घुटनों का आर्थराइटिस) महामारी का रूप ले रहा है। उम्र के साथ होने वाला आर्थराइटिस  ऑस्टियोऑर्थरिटिस  कहलाता है। भारत में ऑस्टियोऑर्थरिटिस आमतौर पर 55-60 की उम्र में होता है। लेकिन आज कम उम्र में भी लोग आर्थराइटिस और अपंगता का शिकार बन रहे हैं।

अक्सर लोग ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियो आर्थराइटिस  को एक ही समझ लेते हैं। आर्थराइटिस ऑर्थरिटिस  में जोड़ों में डीजनरेशन होने लगता है, वहीं ऑस्टियोपोरोसस में बोन मांस कम होने लगता है और हड्डियां टूटने या फ्रैक्चर होने की संभावना बढ़ जाती है। ऑस्टियोपोरोसिस को मूक रोग कहा जा सकता है क्योंकि अक्सर सालों तक मरीज़ को इसका पता ही नहीं चलता, जब हड्डियां टूटने लगती हैं, तब इस बीमारी का पता चल पाता है। ऑस्टियोपोरोसिस में मरीज़ को दर्द नहीं होता, लेकिन दर्द तभी होता है जब फ्रैक्चर हो जाता है।

ऑर्थरिटिस  का सबसे आम प्रकार है ऑस्टियोआथ्राइटिस; इसका असर जोड़ों, विशेष रूप से कूल्हे, घुटने, गर्दन, पीठ के नीचले हिस्से, हाथों और पैरों पर पड़ता है। ऑस्टियोऑर्थरिटिस  आमतौर पर कार्टिलेज जॉइन्ट में होता है। कार्टिलेज हड्डियों की सतह पर मौजूद सॉफ्ट टिश्यू है, जो आर्थराइटिस  के कारण पतला और खुरदरा होने लगता है। इससे हड्डियों के सिरे पर मौजूद कुशन कम होने लगते हैं और हड्डियां एक दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं। 

ऑर्थरिटिस  के लक्षण

आर्थराइटिस के लक्षण इसके प्रकार पर निर्भर करते हैं। इसमें दर्द, अकड़न, ऐंठन, सूजन, हिलने-डुलने या चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है।

ऑर्थरिटिस  के कारण

आर्थराइटिस का मुख्य कारण जीवनशैली से जुड़ा है। भारतीय आबादी में खान-पान के तरीके भी इस बीमारी का कारण बन चुके हैं। शहरी लोग आजकल कम चलते-फिरते हैं, जिससे उनकी शारीरिक एक्टिविटी का स्तर कम हो गया है। महिलाएं कई कारणों से ऑर्थरिटिस  का शिकार हो रही हैं, जैसे चलने-फिरने में कमी, जिसके कारण मसल मांस कम होना आजकल आम हो गया है। ऑर्थरिटिस  से अक्सर सबसे ज़्यादा असर घुटनों, कूल्हों के जोड़ों पर पड़ता है। लगातार बैठे रहने के कारण से मांसपेशियां निष्क्रिय और कमज़ोर होने लगती हैं। पेशियों के कमज़ोर होने से ऑर्थरिटिस  का दर्द बढ़ जाता है और मांसपेशियां खराब होने लगती हैं। शारीरिक एक्टिविटी कम होने के कारण मोटापा भी बढ़ता है, जो ऑर्थरिटिस  के मुख्य कारणों में से एक है।

ऑर्थरिटिस  का असर मरीज़ के चलने-फिरने की क्षमता, रोज़मर्रा के कामों पर पड़ता है। मरीज़ रोज़ाना के कामों में मुश्किल महसूस करने लगता है। समय के साथ कम चलने के कारण उसके कार्डियो-वैस्कुलर स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगता है और डायबिटीज़ की संभावना भी बढ़ जाती है।

ऑर्थरिटिस से कैसे बचें

आर्थराइटिस एजिंग यानि उम्र बढ़ने का एक हिस्सा है, लेकिन सही जीवनशैली के द्वारा इसकी संभावना को कम किया जा सकता है और ऑर्थरिटिस  के कारण होने वाली अपंगता से बचा जा सकता है।

अच्छी जीवनशैली की शुरूआत बचपन से ही होती है। शुरूआती अवस्था में सक्रिय जीवन का अच्छा असर बाद के जीवन पर पड़ता है। अच्छे आहार और नियमित व्यायाम के द्वारा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखा जा सकता है।

ऑर्थरिटिस  से बचने का सबसे अच्छा तरीका है अपने वज़न पर नियन्त्रण रखें। इसके लिए आहार में कार्बोहाइड्रेड का सेवन सीमित मात्रा में करें, ट्रांस-फैट के सेवन से बचें। ध्यान रखें कि आपके आहार में प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य हो।

आजकल लोग उम्र के 50 के दर्शक में जोड़ों की समस्या के शिकार होने लगते हैं। मोटापा और मांसपेशियों की कमज़ोरी बीमारी को और बढ़ाते हैं। इसके लिए नियमित रूप से व्यायाम करें, ताकि जोड़ों का लचीलापन और गतिशीलता बनी रहे।

आर्थराइटिस की शुरूआत में ही अगर व्यायाम शुरू कर दिया जाए तो घुटनों को खराब होने से बचाया जा सकता है। आप शारीरिक व्यायाम की मात्रा बढ़ाकर अपनी सेहत में सुधार ला सकते हैं।

अच्छा मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत ज़रूरी है। तनाव का बुरा असर जोड़ों और हड्डियों की सेहत पर पड़ता है।