राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद ने दारा शिकोह : जीवन और कार्य विषय पर दो दिवसीय सेमिनार सम्पन्न

  |    October 10th, 2019   |   0

नई दिल्ली(संवाददाता)- दारा शिकोह में असाधारण प्रतिभा थी जिसने हिन्दुस्तानी सम्यता व संस्कृति को विस्तृत परिदृश्य में समझने और फैलाने की कोशिश कीं। दारा शिकोह ने सभी धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन किया उसने हिन्दू धर्म को समझने के लिए संस्कृत भाषा भी सीखी और काशी के ब्रहमणों के साथ भी समय बिताया। दारा शिकोह मुसलमान था वह अपने गहन अध्ययन से इस नतीजे पर पहुंचा कि विश्व में विभन्न विचार हैं और रहेंगे लेकिन विश्व प्रेम और आपसी मेलजोल से चलेगी। यह विचार राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के तत्वाधान में आयोजित दारा शिकोहः जीवन और कार्य विषय पर दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि डा.कृष्ण गोपाल, सयुक्त सचिव आर एस एस ने व्यक्ति किए।

सेमिनार में सम्मानीय अतिथि अलीगढ. मुस्लिम युनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. तारक़ि मंसूर ने अपने वक्तव्य में कहा कि दारा शिकोह हमारी साझा संस्कृति की एक रोशन निशानी था। वह इस वैचारिक सिलसिले से जुड़ा हआ था जिसमें एकता, भाई चारा और राष्ट्रीय एकता का विचार सब से अहम था। कुलपति ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दारा शिकोह चेयर क़ायम करने का ऐलान भी किया जिसके तहत दारा शिकोह पर शोध के सिलसिले का आरंभ होगा।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति प्रो. नजमा अख़्तर ने कहा कि दारा शिकोह पर सेमिनार एक नए अध्याय की शुरुआत है जिससे दारा शिकोह पर आगे संवाद के दरवाज़े खुलेंगे। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लाममिया में दारा शिकोह पर विंग बनाने का ऐलान किया।

स्वागत भाषण देते हुए उर्दू परिषद के उपाध्यक्ष प्रो.शाहिद अख़्तर ने कहा कि आज यहां हिन्दुस्तान के ऐसे शहज़ादे की सेवाओं पर बात चीत हो रही है जो एक शहज़ादा कम और सूफ़ी, योगी और सन्यासी ज़्यादा नज़़र आता है। ऐसे सूफ़ी शहज़ादे पर यह सेमिनार यक़ीनन एक मील का पत्थर साबित होगा।

उर्दू परिषद के निदेशक शेख़ अक़ील अहमद ने अपना वक्तव्य देते हुए दारा शिकोह के जीवन और कार्य पर अहम बात की। और दारा शिकोह पर सेमिनार के आयोजन को समय की जरूरत बताया। इस मौक़े पर उर्दू परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘मजमउल-बहरैन’ के उर्दू अनुवाद का भी विमोचन किया गया।

उदघाटन भाषण की संचालन तहसीन मुनव्वर ने किया। जबकि धन्यवाद ज्ञापन परिषद की सहायक निदेशक शमा कौसर यज़दानी ने किया।

पहले सत्र में मोहतरमा आज़रमी दुख़्त सफ़वी ने अपना शोध पत्र पेश किया। इस सत्र की सदारत प्रो. शब्बीर ने की। उन्होंने कहा कि दारा शिकोह ने उपनिषद का अनुवाद किया और हिन्दू और इस्लाम के बीच समानता तलाश की।