सूचना एवं साइबर असुरक्षा कारोबार संचालन में सबसे बड़ा जोखिम है : फिक्की

  |    June 23rd, 2017   |   0

पिछले साल से दो पायदान ऊपर चढ़ा ‘आतंकवाद और चरमपंथ’ का बड़ा जोखिम

नई दिल्ली 23 जून (समाचार डेस्क)- फिक्की द्वारा आज जारी फिक्की-पिंकर्टन इंडिया रिस्क सर्वे में 12 ऐसे जोखिम की चर्चा की गई है जो इस देश में कारोबार की धारणा और संचालन के लिए सबसे प्रमुख खतरे हैं। नए जमाने के जोखिम एक-दूसरे से परस्पर संबद्धित हैं और सभी क्षेत्रों, कार्यक्षेत्र और इलाकों में अतिव्यापित हैं। इस साल के सर्वेक्षण के आधार पर पहचाने जाने वाले नए जोखिमों में शामिल हैं: अनुपालन न होने का जोखिम, कारोबारी निवेश जोखिम और कानूनी नियामक जोखिम।फिक्की- पिंकर्टन इंडिया रिस्क सर्वे (आइआरएस) 2017 में ‘सूचना एवं साइबर असुरक्षा’ को साल 2017 का सबसे बड़ा जोखिम बताया गया है। देश में जिस तरह से विभिन्न परिसंपत्तियों का डिजिटाइजेशन हो रहा है और सेवाएं इंटरनेट तथा मोबाइल के माध्यम से मिलने लगी हैं, उसको देखते हुए ‘सूचना एवं साइबर असुरक्षा’  का जोखिम ज्यादा सुस्पष्ट हो गया है और अभी ऐसी खामियां बनी हुई हैं जिनको हैकर्स भेद सकते हैं। वानक्राइ मालवेयर की घटना इस साल की अभी तक की सबसे बड़ी घटना है, जिसके तहत सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बहुत से कंप्यूटरों पर हमला हुआ। इसलिए मुख्य जोर इस बात पर होना चाहिए कि साइबर सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा प्रणाली बनाई जाए।

‘आतंकवाद और चरमपंथ’ का जोखिम पिछले साल से दो पायदान ऊपर हो गया है और इसे इस साल भारत में कारोबार जगत के लिए दूसरा सबसे बड़ा खतरा माना गया है। साल 2000 से 2016 के बीच आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित 10 देशों की सूची वाले वैश्विक आतंकवाद सूचकांक (जीटीआइ) में भारत का उल्लेख 16 बार किया गया है। कम्युनिस्ट आतंकी संगठनों द्वारा किया जाने वाला वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) सबसे गंभीर आतंकी खतरा बना हुआ है। ‘आतंकवाद और चरपमंथ’ से लगातार बने जोखिम भारतीय बाजार में निवेश की इच्छा रखने वाले निवेशकों के मन में जोखिम की अवधारणा पैदा करते हैं। हालांकि, भारत ने प्रभावी आतंक निरोधी और चरमपंथ निरोधी गतिविधियां चलाने के लिए अपनी सुरक्षा क्षमता में भारी निवेश किया है, लेकिन इस जोखिम की धारणा का जो असर है उससे कारोबार खासकर विदेशी निवेश पर अब भी असर पड़ रहा है।

‘भ्रष्टाचार, घूसखोरी और कॉरपोरेट जालसाजी’ को आइआरएस 2017 में तीसरा स्था मिला है। विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस 2017 रैकिंग में 189 देशों में से भारत को 130वां स्थान मिला है। कुल मिलाकर यह एक धारणा है कि जीएसटी, नोटबंदी, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे नियामक उपायों से भ्रष्टाचार कम हो रहा है, लेकिन भ्रष्टाचार का स्वभाव ऐसा है कि यह पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकता।

इंडिया रिस्क सर्वे 2017 में ‘प्राकृतिक आपदाओं’  को कारोबार के लिए चौथा सबसे बड़ा जोखिम माना गया है, जबकि पिछले साल इसे सातवें स्थान पर रखा गया था। प्राकृतिक आपदाओं के मामले में भारत को ‘उच्च जोखिम’  वाला देश माना जाता है और बाढ़ को देश में कारोबार जगत और समुदायों के लिए सबसे प्रमुख जोखिम में से एक माना जाता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत के पास इस बात की गुंजाइश है कि वह प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप और चक्रवात आदि (जिनकी वजह से हर साल जन-धन की भारी तबाही होती है) के प्रतिकूल असर को कम करने के लिए अपनी संस्थागत क्षमता, वित्तीय संसाधन और बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सके। दिसंबर 2016 में चेन्नई में आने वाले वरदा चक्रवात की वजह से अर्थव्यवस्था को करीब 141 अरब रुपये का नुकसान हुआ था।

‘आग’  को इस साल पांचवें स्थान पर रखा गया है, जो पिछले साल की रैंकिंग से तीन पायदान ऊपर चढ़ गया है। एनसीआरबी के अनुसार साल 2015 में भारत में आग लगने की दुर्घटना के कुल 18,450 मामले सामने आए, जिनमें 1,193 लोग घायल हुए और 17,700 लोग मारे गए।

राजनीतिक एवं प्रशासनिक अक्षमता इंडिया रिस्क सर्वे में साल 2016 और 2017 में लगातार छठे जोखिम के पायदान पर बरकरार है। सामाजिक तनाव और अशांति तथा कृत्रिम राजनीतिक गतिरोध बाधा बने हुए हैं।

पिछले साल के सर्वे के विपरीत इंडिया रिस्क सर्वे 2017 में ‘हड़ताल, बंदी और अशांति छठे पायदान से नीचे आकर सातवें पर पहुंच गए हैं। हालांकि, देश में श्रमिक अशांति काफी व्यापक रही और इसकी वजह से कारोबारी निरंतरता में बाधा आई तथा संचालन लागत में बढ़ोतरी हुई। सितंबर 2016 में ‘दुनिया की सबसे बड़ी’  औद्योगिक कार्रवाई में भारत सरकार की श्रम और आर्थिक नीतियों के विरोध में सार्वजनिक क्षेत्र के करीब 18 करोड़ श्रमिकों ने 24 घंटे का आम हड़ताल किया। शारीरिक परिश्रम की प्रमुखता वाले उद्योगों की, जहां कम कुशल श्रमिक काम करते हैं, इस बात के लिए आलोचना होती है कि उनके यहां कार्य दशाएं उपयुक्त नहीं हैं और वे संतोषजनक वेतन नहीं देते। कृषि क्षेत्र में, जहां जनसंख्या का करीब 47.2 फीसदी हिस्सा लगा हुआ है, किसानों की दुर्दशा की वजह से बड़े पैमाने पर आंदोलन हो रहे हैं। जून 2017 में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों ने अपने पैदावार के लिए ज्यादा दाम तथा कर्जमाफी की मांग को लेकर आंदोलन किया जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों और थोक बाजारों तथा मैन्युफैक्चरिंग उद्योग के लिए सब्जियों, फलों और मीट जैसे कच्चे माल की आपूर्ति पर असर पड़ा।

अपराध भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चिंता बना हुआ है, क्योंकि यह कानून-व्यवस्था की खामी को दर्शाता है और समाज के सभी वर्गों को प्रभावित करता है। पिछले साल के इंडिया रिस्क सर्वे में तीसरे पायदान से उतरकर ‘अपराध’  इस साल एक जोखिम कारक के रूप में आठवें पायदान पर पहुंच गया है। हालांकि, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार साल 2015 में भारत में कुल अपराध में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान कुल 73,26,099 अपराध दर्ज हुए जिनमें से 29,49,400 अपराध भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) के तहत और 43,76,699 अपराध विशेष और स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत दर्ज हुए। देश के बड़े शहरों में दर्ज हुए अपराधों में से 25 फीसदी हिस्सा अकेले दिल्ली का है।

आइआरएस 2017 में ‘कारोबारी जासूसी’  एक स्थान ऊपर चढ़कर नौवें पायदान पर पहुंच गया है। कारोबारी जासूसी की इस विरासत की समस्या का एक दूरगामी असर होता है जिससे किसी कंपनी को भारी नुकसान हो सकता है।

‘बौद्धिक संपदा (आइपी) चोरी’  एक पायदान बढ़कर इस बार दसवें स्थान पर पहुंच गया है। यूएस स्पेशल 301 सूची में भारत का दर्जा इसे सबसे पसंदीदा देशों में शामिल नहीं करता। फिल्मों, संगीत और सॉफ्टवेयर की नकल तथा पाइरेसी जैसे मसले तथा अन्य गैरकानूनी गतिविधियां अब भी जारी हैं।

कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के खतरे को ग्यारहवें पायदान परखा गया है। कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा पर जोखिम का खतरा और उसके निहितार्थ बहुत महत्वपूर्ण हैं। आइआरएस 2017 में इस जाखिम पर विशेष ध्यान दिया गया है, क्योंकि इस बात के लिए प्रबल और व्यापक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है कि महिलाएं कार्यस्थल पर और वहां से आते-जाते समय सहज और सुरक्षित महसूस कर सकें।

आइआरएस 2017 में ‘दुर्घटनाओं’ को 12वें पायदान पर रखा गया है। दुर्घटनाओं की बड़ी संख्या, चाहे वह औद्योगिक हो या व्यक्तिगत, कारोबार के लिए एक बढ़ते बोझ की तरह हैं, खासकर बीमा क्षेत्र के लिए।

फिक्की के महासचिव डॉ. ए दीदार सिंह ने इस बारे में कहा, “कारोबारी प्रतिष्ठानों पर जोखिम देश की तरक्की और विकास के लिए नुकसानदेह होता है। वैश्विक स्तर पर देखें तो जोखिमों की प्रकृति में काफी बदलाव आया है, और उनका घटित होना ज्यादा अप्रत्याशित होता जा रहा है तथा उनका असर ज्यादा गहरा होता जा रहा है, इसलिए जोखिमों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। ऐसे बदलते हुए समय में उभरते हुए जोखिमों को समझना महत्वपूर्ण हो गया है।”

पिंकर्टन के मैनेजिंग डायरेक्टर -भारत एपीएसी और ईएमईए- ग्लोबल स्क्रीनिंग रोहित कर्नाटक ने कहा, “आज के गतिशील वातावरण में जिस तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है, उसके लिए ज्यादा समग्र रणनीतिक रवैया अपनाने की जरूरत है और इसलिए इस बात की तत्काल आवश्यकता बढ़ जाती है कि सुरक्षा प्रबंधन से संबंधित जानकारी खुद तक सीमित रखने वाले रवैए की जगह ज्यादा समग्र उद्यमी जोखिम प्रबंधन के लिए एक ज्यादा सहयोगी प्रक्रिया अपनाई जाए।”