हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को शीघ्र भारत रत्न से नवाजे भारत सरकार : तारक पारकर

  |    February 18th, 2020   |   0

ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने की मांग को लेकर तारक पारकर 1250 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर खरगौन से पहुंचे दिल्ली

नई दिल्ली(राजेश शर्मा)- मध्यप्रदेश खरगौन जिला के सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी तारक पारकर ने भारतीय हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग को लेकर खरगौन से नई दिल्ली तक की 1250 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरा की।

दिल्ली पहुंचने पर मेजर ध्यानचंद के पुत्र अर्जून अवार्डी हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद, प्रपोत्र गौरव ध्यानचंद, क्रिकेटर सुरिन्द्र खन्ना समेत कई अन्य ख्यातिलब्ध हॉकी खिलाड़ी और गणमान्य व्यक्तियों ने फूल मालाओं से तारक पारकर का स्वागत किया।

पारकर ने बताया कि मेजर ध्यानचंद को ‘भारत रत्न’ देने की मांग को लेकर वह 15 दिसंबर 2019 को खरगौन से यात्रा शुरू की और रास्ते में कई तरह की मुश्किलें हुई, लेकिन बिना रुके मैने यह यात्रा आज 13 फरवरी 2020 को नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में मेजर ध्यानचंद (दद्दा) को माल्यार्पण कर समाप्त की। 

इस अवसर पर तारक ने कहा कि सरकार जब कर दद्दा को ‘भारत रत्न’ सम्मान से सम्मानित नहीं करती है, वह तब तक विभिन्न तरह से अपनी मांग को रखते रहेंगे। साथ ही उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में बताया कि वह प्रत्येक दिन करीब 40 किलोमीटर की दूरी तय करते थे और धीरे-धीरे 1250 किलोमीटर की दूरी तय कर दिल्ली पहुंचा हूं। उन्होंने कहा, ‘मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार  दद्दा को जल्द ही भारत रत्न से नवाजेगी। यदि ऐसा नहीं होता है तो मैं खरगौन में रोज एक घंटे धरना प्रदर्शन करूंगा। करीब चार दशकों से युवाओं को ‘नशा छोड़ें, खेलों से जुड़ें तथा पैदल चलें स्वस्थ रहें’ का संदेश दे रहे पारकर ने बताया कि वर्ष 1978 में 1600 किलोमीटर की नेपाल पदयात्रा के दौरान झांसी में दद्दा से मुलाकात हुई। दो दिनों तक उनके घर पर रहा और इस दौरान उनके व्यक्तित्व का मुरीद हो गया। 

गौरतलब है कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग को लेकर पिछले कई वर्षों से आवाज उठाई जा रही है, लेकिन अब तक किसी भी सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की पहल नहीं की है। ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने लगातार 3 ओलंपिक में भारत को हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाया। उन्‍होंने अपने कैरियर में अंग्रेजों के खिलाफ सैकड़ों गोल दागे। ध्‍यानचंद के जादुई खेल से प्रभावित होकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें अपने देश जर्मनी की ओर से खेलने की पेशकश की थी। लेकिन ध्‍यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।