दिल्ली जल बोर्ड ने खो दिया नागरिक शिकायतों का डेटा : प्रजा फाउंडेशन

  |    June 6th, 2018   |   0

दिल्ली नगर निगम के सिविल लाइंस जोन में दर्ज हुई सबसे अधिक नागरिक शिकायतें

नई दिल्ली (समाचार डेस्क)- एनजीओ प्रजा फाउंडेशन ने दिल्ली में पार्षदों  और विधायकों द्वारा किए गए नागरिक मुद्दों और चर्चाओं पर बुधवार को प्रैस क्लब में एक पत्रकार सम्मेलन आयोजित किया गया। इस मौके पर प्रजा फाउंडेशन ने अपना श्वेत पत्र जारी किया।

प्रजा फाउंडेशन द्वारा पंजीकृत नागरिक शिकायतों की संख्या के सम्बन्ध में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दायर आवेदन के जवाब में दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) ने कहा, ‘‘कॉल सेंटर आवेदन के सीआरएम (शिकायत निवारण तंत्र) में तकनीकी समस्या के कारण, 1.10.2017 से 31.12.2017 तक की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।” दिल्ली जल बोर्ड ने तीन महीनो  के नागरिक शिकायतों का डेटा खो दिया हैं।

प्रजा फाउंडेशन के संस्थापक व प्रबंध निदेशक निताई मेहता ने कहा, “सूचना के अधिकार (आरटीआई) के आवेदन के जवाब में भारत में राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी संस्था के आधिकारिक शिकायत तंत्र से मूलभूत जानकारी जैसे पंजीकृत शिकायतों की संख्या के बारे में दिया गया इस तरह का जवाब पूरी तरह से अवांछित है। नागरिकों के मुद्दों के प्रबंधन में इस तरह की लापरवाही निराशाजनक है।”

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अप्रैल-दिसंबर 2017 के दौरान पार्षदों द्वारा वार्ड कमिटी मीटिंग्स में उठाये गये 716 मुद्दे (सभी मुद्दों का 9 प्रतिशत) प्रशासन के कामकाज के प्रति निराशा को दर्शाता हैं।

श्वेत पत्र में बताया गया कि प्रजा द्वारा प्राप्त किए गए आंकड़ें दर्शातें हैं कि उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) के अंतर्गत सिविल लाइंस जोन में वर्ष 2017 में सबसे ज्यादा (51,553) नागरिक शिकायतें देखी गयी। दिल्ली शहर में सभी शिकायतें  तीन वर्षों के दौरान 9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वर्ष 2015 के 3,54,788 से वर्ष 2017 में 3,88,484 हुईं।

राज्य सरकार के अधीन आने वाले प्रमुख नागरिक मुद्दों में, जल आपूर्ति में वर्ष 2017 में सबसे ज्यादा शिकायतें (1,65,735) दर्ज की गईं। नगर निगमों के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख नागरिक मुद्दों में वर्ष 2017 में सबसे ज्यादा शिकायतें (22,574) आवारा कुत्तों, बंदरों, आदि से होने वाली परेशानियों के बारे में दर्ज कराई गई।

विचार-विमर्श के दौरान, आंकड़ों से पता चला कि प्रत्येक चार नवनिर्वाचित पार्षदों में से एक ने अप्रैल-दिसंबर 2017 में आयोजित की गई वार्ड कमिटी मीटिंग में भाग नहीं लिया। रिपोर्ट में बताया गया कि जो भी मुद्दे उठाये गये, उनमे से भी सही मुद्दों को उचित प्राथमिकता नहीं दी गई। उदाहरण के लिए, वर्ष 2017 में, जल संबंधित सभी नागरिक शिकायतें जैसे पानी नहीं आना, दूषित पानी, आदि, दिल्ली की सभी नागरिक शिकायतों का 43 प्रतिशत (1,65,735) थीं। और इनके बावजूद,वर्ष 2017 में उठाए गए सभी मुद्दों में पार्षदों द्वारा केवल 0.४ प्रतिशत (29 मुद्दे) और विधायकों द्वारा केवल 10 प्रतिशत (59 मुद्दे) ही पानी सम्बन्धित मुद्दों पर आधारित थे जो की सभी मुद्दों का एक निराशाजनक प्रतिशत है।

मिलिंद म्हस्के, निदेशक, प्रजा फाउंडेशन, ने बताया, “इस तरह के आंकड़े दर्शाते हैं कि क्यों हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को नागरिकों की आवाजों पर निरन्तर ध्यान देने की जरूरत है। कई बिंदुओं पर, हमारे आंकड़ों से निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा जनता से जुड़े मुद्दों के प्रति उदासीनता दिखाई देती है।”

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) ने अपने घोषणापत्र में अग्नि सुरक्षा का जिक्र किया है, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और आम आदमी पार्टी (आप) ने इस मुद्दे का कोई उल्लेख नहीं किया है। इसके अतिरिक्त, पिछले तीन वर्षों (2015, 2016 और 2017) में, सिर्फ तीन मुद्दे इमारतों/घरों में आग पर विधायकों द्वारा उठाए गए। इसी तरह, वर्ष 2015, 2016 और अप्रैल-दिसंबर 2017 में काउंसलर्स द्वारा मात्र 1 मुद्दा उठाया गया। यह तब है जब 2015, 2016 और 2017 में कुल मिलाकर घरों/इमारतों में आग की कुल 3,060 शिकायतें दर्ज की गईं थी।

श्वेत पत्र में किसी मुद्दे के लिए कई विभागों की विविधता पर ध्यान निर्भरता पर केन्द्रित किया गया और और केंद्रीयकृत शिकायत निवारण तंत्र के निर्माण की सिफारिश की गई, जो नागरिक संतुष्टि के साथ शिकायत दर्ज करने के विभिन्न तरीकों की ऑडिट भी करेगा। इसमें नागरिकों के मुद्दों को संबोधित करते हुए दिल्ली में संचालित नगर निगम, राज्य और केंद्र सरकारों के बीच बेहतर संचार और समन्वयन के साथ एक वृहद नीति तंत्र के लिए प्रेरित किया गया है।

निताई मेहता ने कहा, ‘‘सीवरेज, मृत जानवरों को हटाने, दूषित जल प्रमुख संभावित सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे हैं। इसमें लगातार वृद्धि हो रही है, और नागरिकों को इस समस्या के निवारण के लिए वर्षों से कोई संकेत नहीं दिख रहा है। सरकार द्वारा इन समस्याओं के उन्मूलन के लिए पहल और नीतिगत बदलाव लाने की आवश्यकता है।‘‘