डीटीयू में कुलपति ने फहराया तिरंगा धूमधाम से मनाया गया 71वें गणतंत्रता दिवस

  |    January 27th, 2020   |   0

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विद्यार्थियों व नन्हें बच्चों ने दी रंगा-रंग प्रस्तुतियां

नई दिल्ली(संवाददाता)- दिल्ली प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) प्रांगण में 26 जनवरी को 71वें गणतंत्र दिवस पर कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने तिरंगा फहराया व उनके साथ अनेकों शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, सुरक्षा कर्मियों व विद्यार्थियों ने तिरंगे को सलामी दी। इस अवसर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया जिसमें विद्यार्थियों व नन्हें बच्चों ने रंगा-रंग प्रस्तुतियां दी।

इस दौरान विश्वविद्यालय के डॉ. बीआर अम्बेडकर आडिटोरियम में आयोजित समारोह में मुख्यातिथि के तौर पर बोलते हुए कुलपति ने कहा कि 26 जनवरी का दिन हमारे लिए हर्ष का दिन है, क्योंकि इस दिन हमारे देश का संविधान लागू हुआ था। इसके साथ ही उन्होने कहा कि साल 2019 की एक विशेष उपलब्धि यह रही है कि इस साल ये संविधान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कछ से गोहाटी तक पूरे देश में लागू हो गया है।

उन्होने विस्तार से बताते हुए कहा कि आखिर 26 जनवरी का दिन ही क्यों इसके लिए चुना गया। उन्होने बताया कि इसी दिन 1930 में रावी नदी के तट पर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया था। इसके साथ ही उन्होने लाहौर के उस रावी नदी के तट का भी स्मरण करवाया जहां से यह प्रस्ताव पास किया गया था।

उन्होने कहा कि लाहौर स्वतंत्रता की बहुत सी घटनाओं का साक्षी बना। लाला लाजपत राय की शहादत लाहौर में हुई और उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर हुआ, भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के अंतिम संस्कार भी उसी रावी नदी के तट पर हुए। यानि रावी व उसके पानी ने स्वतंत्रता के आंदोलन में बहुत भूमिका निभाई, लेकिन जब आजादी मिली तो वो लाहौर अलग हो गया। लाहौर सोचता होगा कि मेरा क्या कसूर था?  रावी नदी का पानी भी सोचता होगा कि मुझको क्यों छोड़ दिया! झेलम नदी ने सिकंदर को आगे नहीं बढ़ने दिया, उस झेलम पर भी हमारा अधिकार नहीं रहा। आज का दिन ऐसे प्रतीक चिन्हों, ऐसे लोगों व ऐसी घटनाओं को याद करने का दिन है। महऋषि वाल्मीकि ने रामायण की रचना रावी के तट पर की। गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 17 साल वहीं पर गुजारे। वो सारी इतिहासिक संघर्ष की भूमि हम से चली गई। आज उसे याद करने का दिन है।

कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि  द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण बहुत सारे लोग मारे गे, लेकिन उस का परिणाम कुछ अच्छा भी हुआ। इस युद्ध ने संसार की व्यवस्था को बदला। 1945 में यह युद्ध समाप्त हुआ और 1945 से 1950 तक बहुत से देश आजाद हुए। उन्होने एशिया से उदाहरण देते हुए बताया कि 1945 में ताइवान जापान से आजाद हुआ, 1948 में जापना से उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया आजाद हुए। 1947 में भारत इंग्लैंड से आजाद हुआ। 1945 में निदरलैंड से इन्डोनेशिया आजाद हुआ, 1957 में इंग्लैंड से मलेशिया आजाद हुआ। 1948 में श्रीलंका हुआ, वियतनाम 1945 में फ्रांस से आजाद हुआ, 1948 में ब्रिटेन से बर्मा आजाद हुआ, 1965 में सिंगापूर यूके से आजाद हुआ। यूके से ही 1997 हाँगकाँग व 1965 मालदीव आजाद हुए तथा 1945 में उत्तर चीन जापना से आजाद हुए। यानि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बदले वैश्विक घटनाक्रम से बहुत कुछ नया हुआ। भारत सहित बहुत से देशों के संविधान इसी दौर में बने। उन्होने कहा कि हमारा संविधान हमें शक्तियाँ देता है। संविधान हमारी युद्ध व शांति के समय हर वक्त हमारी मदद करता है। इस ने हमें ताकतवर भी बनाया व देश को एक रखा है।

कुलपति ने कहा कि भारत एक जमाने में ज्ञान का केंद्र था, यहाँ ज्ञान, विज्ञान व प्रज्ञान की परंपरा थी। आज अर्थवव्यवस्था में ज्ञान से जुड़ी अर्थव्यवस्था का हिस्सा सबसे ज्यादा होगा। भारत पहले ज्ञान का केंद्र रहा है। यहाँ तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। आज फिर से इसकी जरूरत है। भारत इस दिशा में सोच भी रहा है और कदम भी बढ़ा रहा है। उन्होने विद्यार्थियों से कहा कि हमारा विश्वविद्यालय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय है। हमें सोचना होगा कि भारत कैसे विश्व शक्ति बने। इसमें सबसे ज्यादा योगदान तकनीक व प्रौद्योगिकी का होगा। उन्होने कहा कि विद्यार्थियों, शिक्षकों व विश्वविद्यालयों को अपने दायित्वों के प्रति सजग होना चाहिए। हमें अपनी चीजें विकसित करनी हैं, जो विश्वविद्यालय से होंगी, सिस्टम होंगे, जिनमें आप सबको अपनी भागीदारी तय करनी है ताकि देश आगे बढ़े।  

कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव प्रो. शमशेर,  पीआरओ अनूप लाठर व प्रो. एसके गर्ग सहित डीन आदि की उपस्थित में कलाकारों को सम्मानित भी किया गया।